Thursday, September 17, 2009

 
रुह की प्यास: डा. प्रमोद कुमार

 

जो खो गया चमक कर
इस फैले हुए फलक में
मैं सारी रात तक के
वो तारा ढूँढता हूँ ।


गुम हो गई तन छूकर
हर रोम को सि‍हरन दे
उस गुमशुदा तरंग को
सागर में ढूँढता हूँ ।


जो दूर हो गई अब
शीतल-सी छाया दे के
इन घनघोर बादलों में
वो बदली ढूँढता हूँ ।


जो घुल के रह गई अब
देके तड़का इस दि‍लको
इस मतलबी चमन में
वो खुशबू ढूँढता हूँ ।


मेरे तन को तृप्त कर के
मन प्यास बुझा गई जो
इस लालची धरा पे
वो बूँद ढूँढता हूँ ।

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Email: drpramod.kumar@yahoo.in

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