Saturday, April 09, 2011
रात-डा. प्रमोद कुमार
रात !
जब भी मैंने
तेरे काले तन को छुआ
एक अजीब सिहरन सी उठी
जो मेरे अंतरमन की
गहराई तक उतर गई
जहाँ दिन की उजली रोशनी भी
न पहुँच सकी ।
रात !
जब भी मैंने
तेरी अंधेरी चुप्पी को सुना
एक कड़वी सच्चाई सी मिली
जो मेरे मस्तिष्क की
गहराई में आ बसी
जिसे मैं दिन के तेज शोर में भी
न सुन सका ।
रात !
जब भी मैंने ,
तेरी काली आँखों में झाँका
वो वफ़ाओं का मंजर देख पाया
जो मेरे दिल की
गहराई में समा गया
जिसे मैं दिन की चमकीली आँखों में भी
न देख सका ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
रात !
जब भी मैंने
तेरे काले तन को छुआ
एक अजीब सिहरन सी उठी
जो मेरे अंतरमन की
गहराई तक उतर गई
जहाँ दिन की उजली रोशनी भी
न पहुँच सकी ।
रात !
जब भी मैंने
तेरी अंधेरी चुप्पी को सुना
एक कड़वी सच्चाई सी मिली
जो मेरे मस्तिष्क की
गहराई में आ बसी
जिसे मैं दिन के तेज शोर में भी
न सुन सका ।
रात !
जब भी मैंने ,
तेरी काली आँखों में झाँका
वो वफ़ाओं का मंजर देख पाया
जो मेरे दिल की
गहराई में समा गया
जिसे मैं दिन की चमकीली आँखों में भी
न देख सका ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
अमावसी संसार-डा. प्रमोद कुमार
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
------------
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
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Email: drpramod.kumar@yahoo.in
नक्षत्र - -डा. प्रमोद कुमार
तुम चाँद तो होगे
लेकिन जब भी तुम्हें
इस हदय -व्योम में
मन की आँखों से देखा
अपने एक प्रभाकर को
छुपाते हुए देखा
ग्रहण लगाते हुए देखा ।
तुम सूर्य तो होगे
लेकिन जब भी तुम्हें
यौवन की हर सुबह को
अलसाई आँखों से देखा
अपने एक नक्षत्र को
छुपाते हुए देखा
मिटाते हुए देखा ।
तुम नक्षत्र तो होगे
लेकिन जब भी मैंने
इस फैले नभ - मंडल को
सूनी रातों में देखा
तुम्हें एक नीच राशि में
आते हुए देखा
उसे चमकाते हुए देखा ।
--------------
Emai: drpramod.kumar@yahoo.in
तुम चाँद तो होगे
लेकिन जब भी तुम्हें
इस हदय -व्योम में
मन की आँखों से देखा
अपने एक प्रभाकर को
छुपाते हुए देखा
ग्रहण लगाते हुए देखा ।
तुम सूर्य तो होगे
लेकिन जब भी तुम्हें
यौवन की हर सुबह को
अलसाई आँखों से देखा
अपने एक नक्षत्र को
छुपाते हुए देखा
मिटाते हुए देखा ।
तुम नक्षत्र तो होगे
लेकिन जब भी मैंने
इस फैले नभ - मंडल को
सूनी रातों में देखा
तुम्हें एक नीच राशि में
आते हुए देखा
उसे चमकाते हुए देखा ।
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Emai: drpramod.kumar@yahoo.in
भँवर
जो दर्द दिये तूने
सीने में दबा बैठे
हर तेरी बेवफ़ाई
आँखों में सज़ा बैठे ।
हर धूप की आँखों में
सूखा सा समन्दर था
हर रात के चेहरे पे
भावों का एक भँवर था
फिर भी इसी भँवर में
कश्ती को डुबा बैठे
जो दर्द दिये तूने
सीने में दबा बैठे ।
हर बात में होंठों पे
प्यार नहीं , एक छल था
हर रोज के मिलने में
स्वार्थ जो हर पल था
हम है कि इसी छल में
जीवन को लुटा बैठे
जो दर्द दिया तूने
सीने में दबा बैठे
हर तेरी बेवफ़ाई
आँखों में सजा बैठे ।
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जो दर्द दिये तूने
सीने में दबा बैठे
हर तेरी बेवफ़ाई
आँखों में सज़ा बैठे ।
हर धूप की आँखों में
सूखा सा समन्दर था
हर रात के चेहरे पे
भावों का एक भँवर था
फिर भी इसी भँवर में
कश्ती को डुबा बैठे
जो दर्द दिये तूने
सीने में दबा बैठे ।
हर बात में होंठों पे
प्यार नहीं , एक छल था
हर रोज के मिलने में
स्वार्थ जो हर पल था
हम है कि इसी छल में
जीवन को लुटा बैठे
जो दर्द दिया तूने
सीने में दबा बैठे
हर तेरी बेवफ़ाई
आँखों में सजा बैठे ।
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रेत का दरिया-डा. प्रमोद कुमार
एक ख्वाब जो देखा था
हसरत थी मेरे दिल की
दो रेत का दरिया था
एक धुंध का बादल था ।
हम उम्र गुजार बैठे
जिनकी तमन्ना करके
वो रात का मंज़र था
एक धुएँ का आँचल था ।
हर पल जिनका चाहा
सब कुछ छोड़ अपना
पानी पे चित्र था वो
बालू का एक महल था ।
एक ख्वाब जो देखा था
हसरत थी मेरे दिल की
वो रेत का दरिया था
एक धुंध का बादल था ।
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Email:drpramod.kumar@yahoo.in
एक ख्वाब जो देखा था
हसरत थी मेरे दिल की
दो रेत का दरिया था
एक धुंध का बादल था ।
हम उम्र गुजार बैठे
जिनकी तमन्ना करके
वो रात का मंज़र था
एक धुएँ का आँचल था ।
हर पल जिनका चाहा
सब कुछ छोड़ अपना
पानी पे चित्र था वो
बालू का एक महल था ।
एक ख्वाब जो देखा था
हसरत थी मेरे दिल की
वो रेत का दरिया था
एक धुंध का बादल था ।
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Email:drpramod.kumar@yahoo.in
