Saturday, April 09, 2011

 
रात-डा. प्रमोद कुमार




रात !

जब भी मैंने

तेरे काले तन को छुआ

एक अजीब सि‍हरन सी उठी

जो मेरे अंतरमन की

गहराई तक उतर गई

जहाँ दि‍न की उजली रोशनी भी

न पहुँच सकी ।





रात !

जब भी मैंने

तेरी अंधेरी चुप्पी को सुना

एक कड़वी सच्चाई सी मि‍ली

जो मेरे मस्ति‍ष्क की

गहराई में आ बसी

जि‍से मैं दि‍न के तेज शोर में भी

न सुन सका ।





रात !

जब भी मैंने ,

तेरी काली आँखों में झाँका

वो वफ़ाओं का मंजर देख पाया

जो मेरे दि‍ल की

गहराई में समा गया

जि‍से मैं दि‍न की चमकीली आँखों में भी

न देख सका ।



Email: drpramod.kumar@yahoo.in


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