Sunday, September 20, 2009
सावन-फुहार-डा. प्रमोद कुमार
तुम कहती थीं कि तुम
एक सावन-फुहार हो
जो केवल मेरी बगिया में
ही बरसती है
लेकिन , कितने सावन आये
चले गए
और तुम मदमस्त हवा के साथ
दूर कहीं जाती रहीं
गहरी काली घटा ले साथ
पानी बरसाती रहीं
और मेरी बगिया के
हर फूल सूख गये
हर कली कराह उठी
पेड ठूंठ बन गये
हर डाली मुरझा उठी
और मैं खड़ा-खड़ा
फूलों की दर्दभरी सूख को
पेड़ों की मूकभरी भूख को
आशा व विश्वास के विनाश को
देखता रहा ।
अन्धा
मैं जन्मजात अन्धा
जो स्वप्न में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सुन सकता हूँ
उस पायल की झनकार को
जो मेरी आँखों के सफेद पर्दे पर
झनझनाती रहती है
गाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो जागे हुए भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस अनुभव कर सकता हूँ
उस साँसों की गर्मी को
जो मेरी आँखों की पलकों को
नर्माती रहती है
सहलाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो दिन में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सूँध सकता हूँ
उस बदन की महक को
जो मेरी आँखों की पुतली को
महकाती रहती है
चहकाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो रोशनी में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस चख सकता हूँ
उन होठों की मिठास को
जो मेरे आँखों के समुद्र में
घुलती रहती है
मिलती रहती हैं ।
नाकामयाबी
जब सूरज डूबने लगता है
और रोशनी कम होने लगती है
एक साँझ का तारा
मेरे खुले दरवाजे से
टिमटिमाता हुआ नज़र आता है
और मैं उसे निहारने लगता हूँ
कुछ ही समय में धीरे-धीरे
यह तारा भी मेरे आँखों से
औझल हो जाता है
और अँधेरी रात में तन्हां
मैं शून्य में कुछ ढूँढने लगता हॅूं
मैं छत पर जाता हूँ
और नीले आकाश में
जब भी देखता हूँ तो
अनगिनत तारे जोर-जोर से
हँस रहे होते हैं
मेरी नाकामयाबी पर ।
योग्यता
शाम को दिनकर
सारे दिन के सफर से
थका - थका लेकिन मुस्कराता हुआ
अस्ताचल की बाहों में चला जाता है
संध्या को
साँझ का तारा
कुछ देर लुभाता है
और अस्तांचल के आँचल में
खो जाता है
रात को चाँद
आता है
कुछ देर चमकता है
और धीरे - धीरे अस्तांचल की
गोद में सो जाता है
मैं अपनी जीवन-संध्या में
अस्तांचल की बाहों में
जाने के लिये
आँचल में खो जाने के लिये
गोद में सो जाने के लिये
मीलों चलता रहा
लेकिन ----
अस्तांचल दूर होता रहा
और यही कहता रहा कि
ये बाहें , ये आँचल और ये गोद
दिनकर , तारे व चाँद के लिए है
और तुम न दिनकर हो , न हो तारा
और न ही तुम चाँद हो ।
अमावसी संसार
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
जीवन - नौका
तुम एक बहती नदी
जिसमें मैंने अपनी नौका उतार दी
और तुम तूफानी हवाओं
का साथ देने लगी
तेज - तेज बहने लगी
मिलने के लिए
समुद्र से
कुछ देर बाद मैंने
अपनी नौका को
विशाल समुद्र के
गहरे तल पर डूबा , पाया
जहाँ कोई किनारा नहीं
कुछ है तो बस केवल तन्हाई
मैं अकेला गहरे पानी में
पड़ा यही सोचना रहा कि
दोष नदी का नहीं
क्योंकि उसकी मंजिल तो समुद्र थी
न ही दोष हवाओं का है
क्योंकि उनकी फ़ितरत तो हबूबी थी
दोष तो मेरा है जिसने अपनी
जीवन - नौका शीतल,स्वच्छ,गहरी,
शांत , झील में नहीं बल्कि एक बहती नदी
में उतार दी ।
तुम कहती थीं कि तुम
एक सावन-फुहार हो
जो केवल मेरी बगिया में
ही बरसती है
लेकिन , कितने सावन आये
चले गए
और तुम मदमस्त हवा के साथ
दूर कहीं जाती रहीं
गहरी काली घटा ले साथ
पानी बरसाती रहीं
और मेरी बगिया के
हर फूल सूख गये
हर कली कराह उठी
पेड ठूंठ बन गये
हर डाली मुरझा उठी
और मैं खड़ा-खड़ा
फूलों की दर्दभरी सूख को
पेड़ों की मूकभरी भूख को
आशा व विश्वास के विनाश को
देखता रहा ।
अन्धा
मैं जन्मजात अन्धा
जो स्वप्न में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सुन सकता हूँ
उस पायल की झनकार को
जो मेरी आँखों के सफेद पर्दे पर
झनझनाती रहती है
गाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो जागे हुए भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस अनुभव कर सकता हूँ
उस साँसों की गर्मी को
जो मेरी आँखों की पलकों को
नर्माती रहती है
सहलाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो दिन में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सूँध सकता हूँ
उस बदन की महक को
जो मेरी आँखों की पुतली को
महकाती रहती है
चहकाती रहती है ।
मैं जन्मजात अन्धा
जो रोशनी में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस चख सकता हूँ
उन होठों की मिठास को
जो मेरे आँखों के समुद्र में
घुलती रहती है
मिलती रहती हैं ।
नाकामयाबी
जब सूरज डूबने लगता है
और रोशनी कम होने लगती है
एक साँझ का तारा
मेरे खुले दरवाजे से
टिमटिमाता हुआ नज़र आता है
और मैं उसे निहारने लगता हूँ
कुछ ही समय में धीरे-धीरे
यह तारा भी मेरे आँखों से
औझल हो जाता है
और अँधेरी रात में तन्हां
मैं शून्य में कुछ ढूँढने लगता हॅूं
मैं छत पर जाता हूँ
और नीले आकाश में
जब भी देखता हूँ तो
अनगिनत तारे जोर-जोर से
हँस रहे होते हैं
मेरी नाकामयाबी पर ।
योग्यता
शाम को दिनकर
सारे दिन के सफर से
थका - थका लेकिन मुस्कराता हुआ
अस्ताचल की बाहों में चला जाता है
संध्या को
साँझ का तारा
कुछ देर लुभाता है
और अस्तांचल के आँचल में
खो जाता है
रात को चाँद
आता है
कुछ देर चमकता है
और धीरे - धीरे अस्तांचल की
गोद में सो जाता है
मैं अपनी जीवन-संध्या में
अस्तांचल की बाहों में
जाने के लिये
आँचल में खो जाने के लिये
गोद में सो जाने के लिये
मीलों चलता रहा
लेकिन ----
अस्तांचल दूर होता रहा
और यही कहता रहा कि
ये बाहें , ये आँचल और ये गोद
दिनकर , तारे व चाँद के लिए है
और तुम न दिनकर हो , न हो तारा
और न ही तुम चाँद हो ।
अमावसी संसार
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
जीवन - नौका
तुम एक बहती नदी
जिसमें मैंने अपनी नौका उतार दी
और तुम तूफानी हवाओं
का साथ देने लगी
तेज - तेज बहने लगी
मिलने के लिए
समुद्र से
कुछ देर बाद मैंने
अपनी नौका को
विशाल समुद्र के
गहरे तल पर डूबा , पाया
जहाँ कोई किनारा नहीं
कुछ है तो बस केवल तन्हाई
मैं अकेला गहरे पानी में
पड़ा यही सोचना रहा कि
दोष नदी का नहीं
क्योंकि उसकी मंजिल तो समुद्र थी
न ही दोष हवाओं का है
क्योंकि उनकी फ़ितरत तो हबूबी थी
दोष तो मेरा है जिसने अपनी
जीवन - नौका शीतल,स्वच्छ,गहरी,
शांत , झील में नहीं बल्कि एक बहती नदी
में उतार दी ।
और तुम-डा. प्रमोद कुमार
मैंने अपने द्वार वर्षो खुले रखे
पहरों तुम्हारा इंतजार किया
और एक दिन अभाग्य ____
सच्चाई और ईमानदारी
का मुखौटा ओढे
प्यार का नाम लेकर
जीवन घर कर गया
और तुम ____
सायं को समुद्र की झूलती लहरों के साथ उठी
एक कोमल भावना सी
बन कर रह गये
जो मेरे दिल की हर धड़कन मे उछलती रहती है ।
सुबह को सूर्य की पहली किरन के साथ उठा
एक सुविचार सा
बन कर रह गये
जो मेरे मस्तिष्क की गहराई में उतरा रहता हैं ।
यौवन में पहले-पहले महसूस होने वाली
प्रथम अनुभूति सी
बनकर रह गये
जो मेरे खून के हर कतरे में बहती रहती हैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
drpk1956@gmail.com
मैंने अपने द्वार वर्षो खुले रखे
पहरों तुम्हारा इंतजार किया
और एक दिन अभाग्य ____
सच्चाई और ईमानदारी
का मुखौटा ओढे
प्यार का नाम लेकर
जीवन घर कर गया
और तुम ____
सायं को समुद्र की झूलती लहरों के साथ उठी
एक कोमल भावना सी
बन कर रह गये
जो मेरे दिल की हर धड़कन मे उछलती रहती है ।
सुबह को सूर्य की पहली किरन के साथ उठा
एक सुविचार सा
बन कर रह गये
जो मेरे मस्तिष्क की गहराई में उतरा रहता हैं ।
यौवन में पहले-पहले महसूस होने वाली
प्रथम अनुभूति सी
बनकर रह गये
जो मेरे खून के हर कतरे में बहती रहती हैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
drpk1956@gmail.com
अंधेरी रात-डा. प्रमोद कुमार
जीवन- सुनहरी शाम में तुम
अंधेरी रात से आते रहे
सूरज दूर छिपता रहा
तारे टिमटिमाते रहे
और चंद्रमा हँसता रहा ।
जीवन-हरे भरे वन में तुम
सूखे पतझड से आते रहे
मन मयूर रोता रहा
पागल पवन हँसती रही
और समय गुनगुनाता रहा ।
जीवन सुशांत नौका पर तुम
क्रूर तुफ़ान से छाते रहे
किनारा दूर होता रहा
मस्त मौजें गाती रही
और पानी तेज बहता रहा ।
------------
जीवन- सुनहरी शाम में तुम
अंधेरी रात से आते रहे
सूरज दूर छिपता रहा
तारे टिमटिमाते रहे
और चंद्रमा हँसता रहा ।
जीवन-हरे भरे वन में तुम
सूखे पतझड से आते रहे
मन मयूर रोता रहा
पागल पवन हँसती रही
और समय गुनगुनाता रहा ।
जीवन सुशांत नौका पर तुम
क्रूर तुफ़ान से छाते रहे
किनारा दूर होता रहा
मस्त मौजें गाती रही
और पानी तेज बहता रहा ।
------------
संतापी मन-डा. प्रमोद कुमार
ए तृप्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने ह€दय की गहराई
में देखा
तुम्हारी सुन्दर आँखों से गिरी
वो कुछ आँसूओं की बूँदें
जो मैंनें अपने रेशमी स्पर्श से
कभी प्यार और विश्वास के साथ
तुम्हारे गुलाबी गालों से
पौंछी थी
मेरे दिल को
दु:ख और संताप सें
घेरे रहती हैं ।
ए सन्तुष्टि !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने विचारों की गहराई में
महसूस किया
वो कुछ शब्द
जो तुमने उस दिन
आसक्ति और लगाव के
साथ कहे थे
मुझे उस विशाल समुद्र
की गहराई में डूबों देते हैं
जो अनन्त यंत्रणाओं एवं वेदनाओं
से भरा रहता है ।
ए शान्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने अन्तरमन की गहराई में
अनुभव किया
तुम्हारे पराग की वह खुशबू
जो तुमने कभी मुझपर बिखरी थी
और मेरी हर साँस
और हर क्षण को
महकाया था
मुझे मेरे तन-मन कोपरेशान किए रहती हैं ।
ए तृप्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने ह€दय की गहराई
में देखा
तुम्हारी सुन्दर आँखों से गिरी
वो कुछ आँसूओं की बूँदें
जो मैंनें अपने रेशमी स्पर्श से
कभी प्यार और विश्वास के साथ
तुम्हारे गुलाबी गालों से
पौंछी थी
मेरे दिल को
दु:ख और संताप सें
घेरे रहती हैं ।
ए सन्तुष्टि !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने विचारों की गहराई में
महसूस किया
वो कुछ शब्द
जो तुमने उस दिन
आसक्ति और लगाव के
साथ कहे थे
मुझे उस विशाल समुद्र
की गहराई में डूबों देते हैं
जो अनन्त यंत्रणाओं एवं वेदनाओं
से भरा रहता है ।
ए शान्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने अन्तरमन की गहराई में
अनुभव किया
तुम्हारे पराग की वह खुशबू
जो तुमने कभी मुझपर बिखरी थी
और मेरी हर साँस
और हर क्षण को
महकाया था
मुझे मेरे तन-मन कोपरेशान किए रहती हैं ।
धुँए का बादल-डा. प्रमोद कुमार
गवा बैठे तम्मना में जिनकी
एक उम्र इंतजार करके,
अरमानों के सूने घर में
हर आहट बैगानी निकली ।
कहते थे बस तुम्हें चाहते हैं
और कोई भी चाहत नहीं है,
झ्ूाठे वादे प्यार मौहब्बत
हर कस्में बेईमानी निकली ।
बिन संग तुम्हारे न जी सकेंगे
और हम न मर सकेंगे
हरेक चाल एक धौका
हर बात लाईमानी निकली ।
दिल ने जब नज़दीक से देखा
ये सूरत भी अनजानी निकली
कस्में वादे प्यार वफा सब
बातें जो बेईमानी निकली
साथी
खाली-खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।
तेरे नयनों की गहराई में
एक प्यार भरा सागर देखा,
तेरे होठॅेंों की नरमाई में
एक अमृत का गागर देखा ।
प्यास भरे इस चित मन को
तुमसा साकी नहीं मिलेगा;
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
तेरी प्यार भरी ऑखों में
अहसास भरा सपना देखा,
तेरी हर मुलाकातों में
चेहरा जो अपना देखा ।
नकली चेहरों की दुनिया में
तुम सा अपना नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
तेरी सॉसों की गरमाई में
सृजन होता जीवन देखा,
पलकों में तेरी छूपा हुआ
प्यार भरा मंजर देखा ।
जो सपनों को साकार बना दे
ऐसा साथी नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
कोमल से तेरे अंगों में
भीगा सा सावन देखा,
प्यार भरे तेरे मन में
वफ़ाओं भरा चितवन देखा ।
सूखे बन में फूल खिला दे
ऐसा मौसम नहीं मिलेगा;
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
मेरे पथ के सूनेपन में
जीने का अहसास जगा दे,
तन्हां से इस जीवन में
अपनापन महसूस करा दें ।
जीवन नौका को इस तूफ़ा में
तुमसा मॉझी नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
जन्नत
जन्नत बनाना चाहते थे
इस धरा को प्यार से,
पर इसे, नफरत फैलाकर
दोज़ख़ बनाके रख दिया ।
निज स्वार्थपूर्ति के लिए
देव-धर्म की बातें करके,
कुछ लोभी मक्कारों ने इसे
नरक बना के रख दिया ।
ख़ुदा का नाम लेने वाले जो
मन में पाप लिए होते हैं,
रोज़ बदलते चेहरों ने इसको
कलुषित करके रख दिया ।
पाक रखना चाहते थे
हर बहती धारा को,
पर पापियों ने इसको
प्रदूषित करके रख दिया ।
मैं हूॅ औैर सब मेरा है
ऐसे कुछ शैतानों ने,
शोषण कर कर के इसको
दुषित करके रख दिया ।
सीधे-साधे लोगों से
निराधार बाते करके,
बेईमान लोगों ने इसको
घृणा से भरके रख दिया ।।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
गवा बैठे तम्मना में जिनकी
एक उम्र इंतजार करके,
अरमानों के सूने घर में
हर आहट बैगानी निकली ।
कहते थे बस तुम्हें चाहते हैं
और कोई भी चाहत नहीं है,
झ्ूाठे वादे प्यार मौहब्बत
हर कस्में बेईमानी निकली ।
बिन संग तुम्हारे न जी सकेंगे
और हम न मर सकेंगे
हरेक चाल एक धौका
हर बात लाईमानी निकली ।
दिल ने जब नज़दीक से देखा
ये सूरत भी अनजानी निकली
कस्में वादे प्यार वफा सब
बातें जो बेईमानी निकली
साथी
खाली-खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।
तेरे नयनों की गहराई में
एक प्यार भरा सागर देखा,
तेरे होठॅेंों की नरमाई में
एक अमृत का गागर देखा ।
प्यास भरे इस चित मन को
तुमसा साकी नहीं मिलेगा;
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
तेरी प्यार भरी ऑखों में
अहसास भरा सपना देखा,
तेरी हर मुलाकातों में
चेहरा जो अपना देखा ।
नकली चेहरों की दुनिया में
तुम सा अपना नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
तेरी सॉसों की गरमाई में
सृजन होता जीवन देखा,
पलकों में तेरी छूपा हुआ
प्यार भरा मंजर देखा ।
जो सपनों को साकार बना दे
ऐसा साथी नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
कोमल से तेरे अंगों में
भीगा सा सावन देखा,
प्यार भरे तेरे मन में
वफ़ाओं भरा चितवन देखा ।
सूखे बन में फूल खिला दे
ऐसा मौसम नहीं मिलेगा;
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
मेरे पथ के सूनेपन में
जीने का अहसास जगा दे,
तन्हां से इस जीवन में
अपनापन महसूस करा दें ।
जीवन नौका को इस तूफ़ा में
तुमसा मॉझी नहीं मिलेगा,
खाली खाली से जीवन को
तुमसा साथी नहीं मिलेगा ।।
जन्नत
जन्नत बनाना चाहते थे
इस धरा को प्यार से,
पर इसे, नफरत फैलाकर
दोज़ख़ बनाके रख दिया ।
निज स्वार्थपूर्ति के लिए
देव-धर्म की बातें करके,
कुछ लोभी मक्कारों ने इसे
नरक बना के रख दिया ।
ख़ुदा का नाम लेने वाले जो
मन में पाप लिए होते हैं,
रोज़ बदलते चेहरों ने इसको
कलुषित करके रख दिया ।
पाक रखना चाहते थे
हर बहती धारा को,
पर पापियों ने इसको
प्रदूषित करके रख दिया ।
मैं हूॅ औैर सब मेरा है
ऐसे कुछ शैतानों ने,
शोषण कर कर के इसको
दुषित करके रख दिया ।
सीधे-साधे लोगों से
निराधार बाते करके,
बेईमान लोगों ने इसको
घृणा से भरके रख दिया ।।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
चॉद तुम आ जाओं न-डा. प्रमोद कुमार
चॉद तुम आ जाओ न ।
फूल की पंखुड़ियों की
सेज़ पर है जो पली,
मस्त पवन के साथ जो
खेलती हुई बड़ी,
पल्लवों के गीत में
संगीत सी है जो बसी,
खुशबू वही आज प्यार से
पूकारती है चॉद को
चॉद तुम आ जाओं न ।
शीतल नमी बूंदों से
काया है जिसकी बनी,
संतरंगी श्रृंगार कर जो
नीली चुनरियों से सजी,
बादलों के बीच जो
इठलाती सी चली,
बदली वही आज प्यार से
पूकारती है चॉद को
चॉद तुम आ जाओं न ।
Emial: drpramod.kumar@yahoo.in
चॉद तुम आ जाओ न ।
फूल की पंखुड़ियों की
सेज़ पर है जो पली,
मस्त पवन के साथ जो
खेलती हुई बड़ी,
पल्लवों के गीत में
संगीत सी है जो बसी,
खुशबू वही आज प्यार से
पूकारती है चॉद को
चॉद तुम आ जाओं न ।
शीतल नमी बूंदों से
काया है जिसकी बनी,
संतरंगी श्रृंगार कर जो
नीली चुनरियों से सजी,
बादलों के बीच जो
इठलाती सी चली,
बदली वही आज प्यार से
पूकारती है चॉद को
चॉद तुम आ जाओं न ।
Emial: drpramod.kumar@yahoo.in
कोई अपना-डा. प्रमोद कुमार
तुम्हे देखा तो जिंदगी, जीने को मचल गई
तुम्हें पाया तो जिंदगी, एक दर्द बन गई
और जाना तो, जीने की तमन्ना निकल गई ।
लोग चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं,
तुम हो कि चेहरों को पढ़ा करते हो;
पल, पल बदलते चेहरों के इस शहर में
तुम हो कि कोई अपना ढूढ़ॉ करते हो ।
लोग झूठे पे कई झूठ बोल लेते हैं,
तुम हो कि बातों में यकीं करते हो;
झूठ को सच्च साबित करने वालों में,
तुम हो कि कोई सच्चा ढ़डंढा करते हो ।
वफ़ा की बात कर जो बेवफ़ाई करते हैं,
वो बस खुद के लिए जीते हैं, मरते हैं;
हजारों ख़ाहिशो हो जिनकी अपनी,
तुम उनसे क्यों उम्मीदें किया करते हो ।
जलाकर ख़ाक कर देंगे तेरे दिल को,
प्यार से हाथ मौहब्बत का बढ़ा न देना;
लूट लेंगे उल्फत के गमों की दौलत भी,
कभी इनको दिल में बसा न लेना ।
बेगानों में अपना ढूढ़नें वाले इंसा,
चेहरों को नहीं दिल को पढ़ा करते हैं;
चमकते गुलिस्ता में असली फूलों को,
चमक से नहीं महक से परखा करते हैं ।
तुम्हे देखा तो जिंदगी, जीने को मचल गई
तुम्हें पाया तो जिंदगी, एक दर्द बन गई
और जाना तो, जीने की तमन्ना निकल गई ।
लोग चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं,
तुम हो कि चेहरों को पढ़ा करते हो;
पल, पल बदलते चेहरों के इस शहर में
तुम हो कि कोई अपना ढूढ़ॉ करते हो ।
लोग झूठे पे कई झूठ बोल लेते हैं,
तुम हो कि बातों में यकीं करते हो;
झूठ को सच्च साबित करने वालों में,
तुम हो कि कोई सच्चा ढ़डंढा करते हो ।
वफ़ा की बात कर जो बेवफ़ाई करते हैं,
वो बस खुद के लिए जीते हैं, मरते हैं;
हजारों ख़ाहिशो हो जिनकी अपनी,
तुम उनसे क्यों उम्मीदें किया करते हो ।
जलाकर ख़ाक कर देंगे तेरे दिल को,
प्यार से हाथ मौहब्बत का बढ़ा न देना;
लूट लेंगे उल्फत के गमों की दौलत भी,
कभी इनको दिल में बसा न लेना ।
बेगानों में अपना ढूढ़नें वाले इंसा,
चेहरों को नहीं दिल को पढ़ा करते हैं;
चमकते गुलिस्ता में असली फूलों को,
चमक से नहीं महक से परखा करते हैं ।
सज़ा-डा. प्रमोद कुमार
जिंदगी की राह में
हम सफर की चाह में
बस एक ख़ता कर बैठे
उनसे वफ़ा कर बैठे ।
बेवफाई हर कदम था
हर करम बेईमानियॉ,
एक अपना दिल दे के
हम ये क्या कर बैठे ।
हर अदा एक सितम थी
हरेक चाल रूसवाईयाँ,
उनसे वफ़ा की उम्मीद
हम ख़ुद से दगा कर बैठे ।
हर बात में था धोखा
हर सोच कलुसित थी,
प्यार करके ऐसे सनम से
हम खूद को सज़ा दे बैठे ।
जो पल गुज़ारे साथ तेरे
वो दर्द भरी सज़ा थी,
ऐसे बेवफ़ा सनम से
क्यों उम्मीदें-वफ़ा कर बैठे ।
जिंदगी की राह में
हम सफर की चाह में
बस एक ख़ता कर बैठे
उनसे वफ़ा कर बैठे ।
बेवफाई हर कदम था
हर करम बेईमानियॉ,
एक अपना दिल दे के
हम ये क्या कर बैठे ।
हर अदा एक सितम थी
हरेक चाल रूसवाईयाँ,
उनसे वफ़ा की उम्मीद
हम ख़ुद से दगा कर बैठे ।
हर बात में था धोखा
हर सोच कलुसित थी,
प्यार करके ऐसे सनम से
हम खूद को सज़ा दे बैठे ।
जो पल गुज़ारे साथ तेरे
वो दर्द भरी सज़ा थी,
ऐसे बेवफ़ा सनम से
क्यों उम्मीदें-वफ़ा कर बैठे ।
ये न बता सकूँगा मैं-डा. प्रमोद कुमार
तेरे प्यार ने है क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें हैं नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
जब साथ तुम्हारा पाता था
सत संगत बन जाती थी,
मन मीरा बन जाता था
मन वीणा बन जाती थी,
तेरे साथ ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं ।
प्यार और विश्वास के स्वर
जब तुमसे मैं सुनता था,
तन मन्दिर बन जाता था
मन मन्दिर में पाता था,
उस विश्वास ने है क्या दिया
ये न बता सकूंगा मैं ।
तेरे प्यार ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें है नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
तेरे प्यार ने है क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें हैं नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
जब साथ तुम्हारा पाता था
सत संगत बन जाती थी,
मन मीरा बन जाता था
मन वीणा बन जाती थी,
तेरे साथ ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं ।
प्यार और विश्वास के स्वर
जब तुमसे मैं सुनता था,
तन मन्दिर बन जाता था
मन मन्दिर में पाता था,
उस विश्वास ने है क्या दिया
ये न बता सकूंगा मैं ।
तेरे प्यार ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें है नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
परिचय
परिचय: डा. प्रमोद कुमार
जन्म तिथि : मई 30, 1956
शिक्षा : बी.ए. (दिल्ली)
एम.ए. (राजनीति शास्त्र)
एम.ए. (इतिहास)
एलएल.बी. (दिल्ली)
एलएल.एम. (दिल्ली)
उपाधिपत्र अन्तर्राष्टीय विधि (दिल्ली)
उपाधिपत्र औद्योगिक सम्बंध एवं कार्मिक प्रबन्ध (दिल्ली)
एम.बी.ए. (मानव संसाधन), मुम्बई
पीएच.डी. (दिल्ली)
अन्य प्रकाशन : 1) ``जफ़ाओं का मंज़र'' - कविता संग्रह सन् 1995
में प्रकाशित
2) समय पटल के अक्षर- कविता संग्रह-2008 में प्रकाशित
3) कच्चा मकान- कहानी संग्रह- 2008 में प्रकाशित
4) लगभग 250 से अधिक कहानी, लेख, कविताएँ एवं
अन्य रचनाओं का राष्ट्रीय पत्रिकाओं और अनेक
प्रतिष्ठित दैनिक पत्रों में प्रकाशन
योगदान : 1) ``ज्ञानोदय'' एवं ``निर्मल'' नामक गैर-सरकारी
संगठनों का संचालन । पर्यावरण हितैषी वातावरण
निर्माण एवं साक्षरता को बढ़ाने हेतु सर्मपित
2) शिक्षण संस्थाओं में अतिथि-वक्ता के रूप विविध
विषयों पर सत्रों का संचालन
-: पता :-
drpkrbi@yahoo.co.in
---------------------
परिचय: डा. प्रमोद कुमार
जन्म तिथि : मई 30, 1956
शिक्षा : बी.ए. (दिल्ली)
एम.ए. (राजनीति शास्त्र)
एम.ए. (इतिहास)
एलएल.बी. (दिल्ली)
एलएल.एम. (दिल्ली)
उपाधिपत्र अन्तर्राष्टीय विधि (दिल्ली)
उपाधिपत्र औद्योगिक सम्बंध एवं कार्मिक प्रबन्ध (दिल्ली)
एम.बी.ए. (मानव संसाधन), मुम्बई
पीएच.डी. (दिल्ली)
अन्य प्रकाशन : 1) ``जफ़ाओं का मंज़र'' - कविता संग्रह सन् 1995
में प्रकाशित
2) समय पटल के अक्षर- कविता संग्रह-2008 में प्रकाशित
3) कच्चा मकान- कहानी संग्रह- 2008 में प्रकाशित
4) लगभग 250 से अधिक कहानी, लेख, कविताएँ एवं
अन्य रचनाओं का राष्ट्रीय पत्रिकाओं और अनेक
प्रतिष्ठित दैनिक पत्रों में प्रकाशन
योगदान : 1) ``ज्ञानोदय'' एवं ``निर्मल'' नामक गैर-सरकारी
संगठनों का संचालन । पर्यावरण हितैषी वातावरण
निर्माण एवं साक्षरता को बढ़ाने हेतु सर्मपित
2) शिक्षण संस्थाओं में अतिथि-वक्ता के रूप विविध
विषयों पर सत्रों का संचालन
-: पता :-
drpkrbi@yahoo.co.in
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Thursday, September 17, 2009
रुह की प्यास: डा. प्रमोद कुमार
जो खो गया चमक कर
इस फैले हुए फलक में
मैं सारी रात तक के
वो तारा ढूँढता हूँ ।
गुम हो गई तन छूकर
हर रोम को सिहरन दे
उस गुमशुदा तरंग को
सागर में ढूँढता हूँ ।
जो दूर हो गई अब
शीतल-सी छाया दे के
इन घनघोर बादलों में
वो बदली ढूँढता हूँ ।
जो घुल के रह गई अब
देके तड़का इस दिलको
इस मतलबी चमन में
वो खुशबू ढूँढता हूँ ।
मेरे तन को तृप्त कर के
मन प्यास बुझा गई जो
इस लालची धरा पे
वो बूँद ढूँढता हूँ ।
----------------
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
जो खो गया चमक कर
इस फैले हुए फलक में
मैं सारी रात तक के
वो तारा ढूँढता हूँ ।
गुम हो गई तन छूकर
हर रोम को सिहरन दे
उस गुमशुदा तरंग को
सागर में ढूँढता हूँ ।
जो दूर हो गई अब
शीतल-सी छाया दे के
इन घनघोर बादलों में
वो बदली ढूँढता हूँ ।
जो घुल के रह गई अब
देके तड़का इस दिलको
इस मतलबी चमन में
वो खुशबू ढूँढता हूँ ।
मेरे तन को तृप्त कर के
मन प्यास बुझा गई जो
इस लालची धरा पे
वो बूँद ढूँढता हूँ ।
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Email: drpramod.kumar@yahoo.in
Labels: ३.
Thursday, September 10, 2009
समय -पटल के अक्षर-डा प्रमोद कुमार
सूरज ! मैंने तुम्हें,
हर उन अक्षरों को
मिटाने को कहा था
जो मैंने दर्द की सियाही से
समय पटल पर लिखे थे
लेकिन तुम,
हर सुबह उगकर
हर उन अक्षरों को
चमकाकर
मैंरे मन में
दर्द का अहसास
जगाते रहे ।
यही नहीं, तुम,
हर सुबह आकर
उम्र से मेरी
एक एक दिन कम होने का
अहसास कराते रहे
और मैं हर रोज
बचे दिनों में
हर उन अक्षरों को
बार-बार पढ़ता रहा
जो मैंने दर्द की सियाही से
समय पटल पर
पहरों बैठ लिखे थे ।
उम्र बीत जाने पर
मैं मैं न रहा,
पर वो दर्द की सियाही से
समय-पटल पर लिखे
कुछ आक्षर भर हलाल हुई
एक जिंदगी की
दर्द भरी दास्ता
कहते रहे ।
---------------
याद-डा प्रमोद कुमार
जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
एक दोपहरियॉ सावन में
हम बारिश से बचने को
जब दूर पहाड़ी के पीछे
आ बैठे थे आम्बियॉ नीचे
जैसे ही छेड़ा था मैंने
तेरी वीणा के तारों को
सागर सारे तेरे मन के
मचल उठे थे उफनन् को
सावन कितने तेरे तन से
तरस गये थे बरसन् को
गिरती बूॅदों की तानों में
कोयल ने गीत सुनाया था
अब जब भी कोयलियॉ
गीत प्यार का गाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
जब घटा उमड़ कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।
एक सॉझ किनारे गंगा के
जब छॉव पीपलियॉ बैठे थे
मन ही मन तब कस्में खाई
ऑखों ने कुछ बातें की थी
अपनी गोद सिर रख मेरा
जब तूने सहलाया था
लहराते काले बालों में
चॉद चमकता देखा था
लाल गुलाबी तेरे गालों में
एक फूल खिला देखा था
लहरों ने साज बजाया था
और गीत खगों ने गाया था
अब जब भी जल तरंग
कोई संगीत सुनाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।
डा प्रमोद कुमार मेल करे drpkrbi@yahoo.co.in
सूरज ! मैंने तुम्हें,
हर उन अक्षरों को
मिटाने को कहा था
जो मैंने दर्द की सियाही से
समय पटल पर लिखे थे
लेकिन तुम,
हर सुबह उगकर
हर उन अक्षरों को
चमकाकर
मैंरे मन में
दर्द का अहसास
जगाते रहे ।
यही नहीं, तुम,
हर सुबह आकर
उम्र से मेरी
एक एक दिन कम होने का
अहसास कराते रहे
और मैं हर रोज
बचे दिनों में
हर उन अक्षरों को
बार-बार पढ़ता रहा
जो मैंने दर्द की सियाही से
समय पटल पर
पहरों बैठ लिखे थे ।
उम्र बीत जाने पर
मैं मैं न रहा,
पर वो दर्द की सियाही से
समय-पटल पर लिखे
कुछ आक्षर भर हलाल हुई
एक जिंदगी की
दर्द भरी दास्ता
कहते रहे ।
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याद-डा प्रमोद कुमार
जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
एक दोपहरियॉ सावन में
हम बारिश से बचने को
जब दूर पहाड़ी के पीछे
आ बैठे थे आम्बियॉ नीचे
जैसे ही छेड़ा था मैंने
तेरी वीणा के तारों को
सागर सारे तेरे मन के
मचल उठे थे उफनन् को
सावन कितने तेरे तन से
तरस गये थे बरसन् को
गिरती बूॅदों की तानों में
कोयल ने गीत सुनाया था
अब जब भी कोयलियॉ
गीत प्यार का गाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
जब घटा उमड़ कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।
एक सॉझ किनारे गंगा के
जब छॉव पीपलियॉ बैठे थे
मन ही मन तब कस्में खाई
ऑखों ने कुछ बातें की थी
अपनी गोद सिर रख मेरा
जब तूने सहलाया था
लहराते काले बालों में
चॉद चमकता देखा था
लाल गुलाबी तेरे गालों में
एक फूल खिला देखा था
लहरों ने साज बजाया था
और गीत खगों ने गाया था
अब जब भी जल तरंग
कोई संगीत सुनाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।
जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।
डा प्रमोद कुमार मेल करे drpkrbi@yahoo.co.in
