Thursday, September 10, 2009

 
समय -पटल के अक्षर-डा प्रमोद कुमार

सूरज ! मैंने तुम्हें,
हर उन अक्षरों को
मि‍टाने को कहा था
जो मैंने दर्द की सि‍याही से
समय पटल पर लि‍खे थे
लेकि‍न तुम,
हर सुबह उगकर
हर उन अक्षरों को
चमकाकर
मैंरे मन में
दर्द का अहसास
जगाते रहे ।

यही नहीं, तुम,
हर सुबह आकर
उम्र से मेरी
एक एक दि‍न कम होने का
अहसास कराते रहे
और मैं हर रोज
बचे दि‍नों में
हर उन अक्षरों को
बार-बार पढ़ता रहा
जो मैंने दर्द की सि‍याही से
समय पटल पर
पहरों बैठ लि‍खे थे ।
उम्र बीत जाने पर
मैं मैं न रहा,
पर वो दर्द की सि‍याही से
समय-पटल पर लि‍खे
कुछ आक्षर भर हलाल हुई
एक जिंदगी की
दर्द भरी दास्ता
कहते रहे ।
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याद-डा प्रमोद कुमार


जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।

एक दोपहरि‍यॉ सावन में
हम बारि‍श से बचने को
जब दूर पहाड़ी के पीछे
आ बैठे थे आम्बि‍यॉ नीचे
जैसे ही छेड़ा था मैंने
तेरी वीणा के तारों को
सागर सारे तेरे मन के
मचल उठे थे उफनन् को
सावन कि‍तने तेरे तन से
तरस गये थे बरसन् को

गि‍रती बूॅदों की तानों में
कोयल ने गीत सुनाया था
अब जब भी कोयलि‍यॉ
गीत प्यार का गाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।

जब घटा उमड़ कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।

एक सॉझ कि‍नारे गंगा के
जब छॉव पीपलि‍यॉ बैठे थे
मन ही मन तब कस्में खाई
ऑखों ने कुछ बातें की थी


अपनी गोद सि‍र रख मेरा
जब तूने सहलाया था
लहराते काले बालों में
चॉद चमकता देखा था
लाल गुलाबी तेरे गालों में
एक फूल खि‍ला देखा था


लहरों ने साज बजाया था
और गीत खगों ने गाया था
अब जब भी जल तरंग
कोई संगीत सुनाएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।

जब घटा उमड़कर आएगी
तब याद तुम्हारी आएगी ।।

डा प्रमोद कुमार मेल करे drpkrbi@yahoo.co.in

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