Sunday, September 20, 2009

 
और तुम-डा. प्रमोद कुमार


मैंने अपने द्वार वर्षो खुले रखे
पहरों तुम्हारा इंतजार कि‍या
और एक दि‍न अभाग्य ____
सच्चाई और ईमानदारी
का मुखौटा ओढे
प्यार का नाम लेकर
जीवन घर कर गया
और तुम ____


सायं को समुद्र की झूलती लहरों के साथ उठी
एक कोमल भावना सी
बन कर रह गये
जो मेरे दि‍ल की हर धड़कन मे उछलती रहती है ।


सुबह को सूर्य की पहली कि‍रन के साथ उठा
एक सुवि‍चार सा
बन कर रह गये
जो मेरे मस्ति‍ष्क की गहराई में उतरा रहता हैं ।


यौवन में पहले-पहले महसूस होने वाली
प्रथम अनुभूति‍ सी
बनकर रह गये
जो मेरे खून के हर कतरे में बहती रहती हैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
           drpk1956@gmail.com

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