Sunday, September 20, 2009

 
सावन-फुहार-डा. प्रमोद कुमार


तुम कहती थीं कि‍ तुम
एक सावन-फुहार हो
जो केवल मेरी बगि‍या में
ही बरसती है


लेकि‍न , कि‍तने सावन आये
चले गए
और तुम मदमस्त हवा के साथ
दूर कहीं जाती रहीं
गहरी काली घटा ले साथ
पानी बरसाती रहीं
और मेरी बगि‍या के
हर फूल सूख गये
हर कली कराह उठी
पेड ठूंठ बन गये
हर डाली मुरझा उठी
और मैं खड़ा-खड़ा
फूलों की दर्दभरी सूख को
पेड़ों की मूकभरी भूख को
आशा व वि‍श्वास के वि‍नाश को
देखता रहा ।



अन्धा
मैं जन्मजात अन्धा
जो स्वप्न में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सुन सकता हूँ
उस पायल की झनकार को
जो मेरी आँखों के सफेद पर्दे पर
झनझनाती रहती है
गाती रहती है ।

मैं जन्मजात अन्धा
जो जागे हुए भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस अनुभव कर सकता हूँ
उस साँसों की गर्मी को
जो मेरी आँखों की पलकों को
नर्माती रहती है
सहलाती रहती है ।

मैं जन्मजात अन्धा
जो दि‍न में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस सूँध सकता हूँ
उस बदन की महक को
जो मेरी आँखों की पुतली को
महकाती रहती है
चहकाती रहती है ।

मैं जन्मजात अन्धा
जो रोशनी में भी
तुम्हें देख नहीं सकता
बस चख सकता हूँ
उन होठों की मि‍ठास को
जो मेरे आँखों के समुद्र में
घुलती रहती है
मि‍लती रहती हैं ।

नाकामयाबी

जब सूरज डूबने लगता है
और रोशनी कम होने लगती है
एक साँझ का तारा
मेरे खुले दरवाजे से
टि‍मटि‍माता हुआ नज़र आता है
और मैं उसे नि‍हारने लगता हूँ
कुछ ही समय में धीरे-धीरे
यह तारा भी मेरे आँखों से
औझल हो जाता है
और अँधेरी रात में तन्हां
मैं शून्य में कुछ ढूँढने लगता हॅूं
मैं छत पर जाता हूँ
और नीले आकाश में
जब भी देखता हूँ तो
अनगि‍नत तारे जोर-जोर से
हँस रहे होते हैं
मेरी नाकामयाबी पर ।

योग्यता
शाम को दि‍नकर
सारे दि‍न के सफर से
थका - थका लेकि‍न मुस्कराता हुआ
अस्ताचल की बाहों में चला जाता है

संध्या को
साँझ का तारा
कुछ देर लुभाता है
और अस्तांचल के आँचल में
खो जाता है

रात को चाँद
आता है
कुछ देर चमकता है
और धीरे - धीरे अस्तांचल की
गोद में सो जाता है

मैं अपनी जीवन-संध्या में
अस्तांचल की बाहों में
जाने के लि‍ये
आँचल में खो जाने के लि‍ये
गोद में सो जाने के लि‍ये
मीलों चलता रहा
लेकि‍न ----

अस्तांचल दूर होता रहा
और यही कहता रहा कि‍
ये बाहें , ये आँचल और ये गोद
दि‍नकर , तारे व चाँद के लि‍ए है
और तुम न दि‍नकर हो , न हो तारा
और न ही तुम चाँद हो ।

अमावसी संसार
इस अमावसी संसार के
एक मि‍ट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।


हर दि‍न गुल - महक
तन्हाई का साथ नि‍भाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।


हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।


और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
कि‍सी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब नि‍हारता
रहता हूँ ।


जीवन - नौका

तुम एक बहती नदी
जि‍समें मैंने अपनी नौका उतार दी
और तुम तूफानी हवाओं
का साथ देने लगी
तेज - तेज बहने लगी
मि‍लने के लि‍ए
समुद्र से

कुछ देर बाद मैंने
अपनी नौका को
वि‍शाल समुद्र के
गहरे तल पर डूबा , पाया
जहाँ कोई कि‍नारा नहीं
कुछ है तो बस केवल तन्हाई
मैं अकेला गहरे पानी में
पड़ा यही सोचना रहा कि‍
दोष नदी का नहीं
क्योंकि‍ उसकी मंजि‍ल तो समुद्र थी

न ही दोष हवाओं का है
क्योंकि‍ उनकी फ़ि‍तरत तो हबूबी थी
दोष तो मेरा है जि‍सने अपनी
जीवन - नौका शीतल,स्वच्छ,गहरी,
शांत , झील में नहीं बल्कि‍ एक बहती नदी
में उतार दी ।

Comments:
This is with reference to poem sawan fuhaar which which depicts stark reality. It reminds me of a couplet by a famous shayar:
shikwa nahin mujhe kuchh
teri bewafai ka hargiz
gila to tab ho jab tune
kisi se bhi nibhahi ho

similar feelings are expressed in a punjabi song also perhaps written by Shiv Kumar Batalvi:
changa hoya tun parai ho gaiyon
mukk gai chinta tainu apnaan di
 
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