Sunday, September 20, 2009

 
अंधेरी रात-डा. प्रमोद कुमार

जीवन- सुनहरी शाम में तुम
अंधेरी रात से आते रहे
सूरज दूर छि‍पता रहा
तारे टि‍मटि‍माते रहे
और चंद्रमा हँसता रहा ।


जीवन-हरे भरे वन में तुम
सूखे पतझड से आते रहे
मन मयूर रोता रहा
पागल पवन हँसती रही
और समय गुनगुनाता रहा ।


जीवन सुशांत नौका पर तुम
क्रूर तुफ़ान से छाते रहे
कि‍नारा दूर होता रहा
मस्त मौजें गाती रही
और पानी तेज बहता रहा ।

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