Sunday, September 20, 2009
ये न बता सकूँगा मैं-डा. प्रमोद कुमार
तेरे प्यार ने है क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें हैं नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
जब साथ तुम्हारा पाता था
सत संगत बन जाती थी,
मन मीरा बन जाता था
मन वीणा बन जाती थी,
तेरे साथ ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं ।
प्यार और विश्वास के स्वर
जब तुमसे मैं सुनता था,
तन मन्दिर बन जाता था
मन मन्दिर में पाता था,
उस विश्वास ने है क्या दिया
ये न बता सकूंगा मैं ।
तेरे प्यार ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें है नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
तेरे प्यार ने है क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें हैं नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
जब साथ तुम्हारा पाता था
सत संगत बन जाती थी,
मन मीरा बन जाता था
मन वीणा बन जाती थी,
तेरे साथ ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं ।
प्यार और विश्वास के स्वर
जब तुमसे मैं सुनता था,
तन मन्दिर बन जाता था
मन मन्दिर में पाता था,
उस विश्वास ने है क्या दिया
ये न बता सकूंगा मैं ।
तेरे प्यार ने हैं क्या दिया
ये ना बता सकूंगा मैं,
आज क्यों ऑखें है नम
ये न बता सकूंगा मैं ।
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
