Sunday, September 20, 2009
संतापी मन-डा. प्रमोद कुमार
ए तृप्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने ह€दय की गहराई
में देखा
तुम्हारी सुन्दर आँखों से गिरी
वो कुछ आँसूओं की बूँदें
जो मैंनें अपने रेशमी स्पर्श से
कभी प्यार और विश्वास के साथ
तुम्हारे गुलाबी गालों से
पौंछी थी
मेरे दिल को
दु:ख और संताप सें
घेरे रहती हैं ।
ए सन्तुष्टि !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने विचारों की गहराई में
महसूस किया
वो कुछ शब्द
जो तुमने उस दिन
आसक्ति और लगाव के
साथ कहे थे
मुझे उस विशाल समुद्र
की गहराई में डूबों देते हैं
जो अनन्त यंत्रणाओं एवं वेदनाओं
से भरा रहता है ।
ए शान्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने अन्तरमन की गहराई में
अनुभव किया
तुम्हारे पराग की वह खुशबू
जो तुमने कभी मुझपर बिखरी थी
और मेरी हर साँस
और हर क्षण को
महकाया था
मुझे मेरे तन-मन कोपरेशान किए रहती हैं ।
ए तृप्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने ह€दय की गहराई
में देखा
तुम्हारी सुन्दर आँखों से गिरी
वो कुछ आँसूओं की बूँदें
जो मैंनें अपने रेशमी स्पर्श से
कभी प्यार और विश्वास के साथ
तुम्हारे गुलाबी गालों से
पौंछी थी
मेरे दिल को
दु:ख और संताप सें
घेरे रहती हैं ।
ए सन्तुष्टि !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने विचारों की गहराई में
महसूस किया
वो कुछ शब्द
जो तुमने उस दिन
आसक्ति और लगाव के
साथ कहे थे
मुझे उस विशाल समुद्र
की गहराई में डूबों देते हैं
जो अनन्त यंत्रणाओं एवं वेदनाओं
से भरा रहता है ।
ए शान्ति !
जब भी मैंने तुम्हें
अपने अन्तरमन की गहराई में
अनुभव किया
तुम्हारे पराग की वह खुशबू
जो तुमने कभी मुझपर बिखरी थी
और मेरी हर साँस
और हर क्षण को
महकाया था
मुझे मेरे तन-मन कोपरेशान किए रहती हैं ।
