Saturday, April 09, 2011
अमावसी संसार-डा. प्रमोद कुमार
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
------------
Email: drpramod.kumar@yahoo.in
इस अमावसी संसार के
एक मिट्टी के घर में
तन्हाई बसती है ।
हर दिन गुल - महक
तन्हाई का साथ निभाने
दूर कहीं से आ जाती है
तन - मन को महका जाती है ।
हर रात हवा का झोंका
तन्हाई से बातें करने
दूर कहीं से आ जाता है
तन - मन को चहका जाता है ।
और मैं अकेला
इस अन्धे संसार में
उस घर की दीवारों के
किसी कोने में
तन्हा बैठा
यह सब निहारता
रहता हूँ ।
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Email: drpramod.kumar@yahoo.in
