Saturday, April 09, 2011

 
भँवर




जो दर्द दि‍ये तूने

सीने में दबा बैठे

हर तेरी बेवफ़ाई

आँखों में सज़ा बैठे ।



हर धूप की आँखों में

सूखा सा समन्दर था

हर रात के चेहरे पे

भावों का एक भँवर था



फि‍र भी इसी भँवर में

कश्ती को डुबा बैठे

जो दर्द दि‍ये तूने

सीने में दबा बैठे ।



हर बात में होंठों पे

प्यार नहीं , एक छल था

हर रोज के मि‍लने में

स्वार्थ जो हर पल था



हम है कि‍ इसी छल में

जीवन को लुटा बैठे

जो दर्द दि‍या तूने

सीने में दबा बैठे

हर तेरी बेवफ़ाई

आँखों में सजा बैठे ।

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