Sunday, March 20, 2011

 
तेरी - मेरी दुनि‍या-डा. प्रमोद कुमार


मेरी दुनि‍या
जि‍समें ____
वि‍चारहीन बाते हैं
चाँदहीन रातें हैं
व्यवहारहीन रि‍श्ते हैं
चेहरेहीन बसते हैं
लहरहीन समन्दर हैं
चमकहीन प्रभाकर हैं
खुशबूहीन चमेली हैं
जिंदगी अकेली हैं
प्यार की अनि‍च्छा है
और न कोई शि‍क्षा है
न भूल है न कबूल
न भक्ति‍ है न शक्ति‍
न सच है न है झूठ
न पैसा न है लूट

लेकि‍न ,
तेरी दुनि‍या से अच्छी है
जि‍समें ____
झूठ के वि‍चार हैं
मक्कारी का व्यवहार हैं
चेहरे पर चेहरे हैं
सच पर पेहरे हैं
रि‍श्ते हैं नाते हैं
स्वार्थ भरी बातें हैं
प्यार एक व्यापार हैं
दि‍खावटी व्यवहार हैं
का$ाज के फूल हैं
सच्चाई एक भूल हैं
भौति‍क सुख ही मूल हैं
पैसा बि‍न सब शूल हैं
ईमानदारी एक `आह' हैं
बेवफ़ाई एक राह है
---------------------

2. देव


मैं कायर था
इसलि‍ए तुम्हें
चाहता रहा , बुलाता रहा
क्योंकि‍ मैं व्यवस्था से
लड़ नहीं सकता था
पर हां समझौता कर सकता था ।


मैं स्वार्थी था
इसलि‍ए तुम्हें
चाहता रहा , बुलाता रहा
क्योंकि‍ मैं कि‍सी को
कुछ दे नहीं सकता था
पर हां ले जरूर सकता था ।


मैं भेागी था
इसलि‍ए तुम्हें
चाहता रहा, बुलाता रहा
क्योंकि‍ मैं कोई नि‍र्माण
नही कर सकता था
पर हां ध्वंस जरूर कर सकता था ।

Comments:
Poems written by Dr.Pramod kumar are symbolic of the conflicts in which man has to survive in modern times.Although he wants to fight with the establishment but somehow is forced by the circumstances to reconcile with the existing system.All the poems are capable of touching your heart and you are forced to think.
 
Post a Comment



<< Home

This page is powered by Blogger. Isn't yours?