Tuesday, March 22, 2011

 
भटकाव-डा. प्रमोद कुमार


तुम मेरी सांसों में महकती हो

मैं ये मानता हूँ

पर क्यों ये सांसें

तुम्हारी सांसों में

घुलने को तरसती हैं

ये मैं जानता नहीं

तुम मेरे मन में बसी हो

ये मैं मानता हूँ

पर क्यों ये हाथ

तुम्हारे कोमल स्पर्श

पाने को मचलते हैं

ये मैं जानता नहीं

तुम मेरे शब्दों में चहकती हो

ये मैं मानता हूँ

पर क्यों ये कर्ण

तुम्हारी बातों को

सुनने को तरसते हैं

ये मैं जानता नहीं

तुम मेरे दिल घर कर गई हो

ये मैं मानता हूँ

पर क्यों ये आँखें

तुम्हारे चेहरे को

देखने को भटकती हैं

ये मैं जानता नहीं

तुम मेरे हर कतरे में बहती हो

ये मैं मानता हूँ

पर क्यों ये होठ

तुम्हारे मुख को

चूमने के लिए तरसते हैं

ये मैं जानता नहीं

तुम मुझमें हो मैं तुझमें हूँ

मैं ये मानता हूँ

पर क्यों ये मन

तुम्हे हमेशा

मिलने को भटकता है

ये मैं जानता नहीं ।

डा. प्रमोद कुमार

Email: drpk1956@gmail.com

drpramod.kumar@yahoo.in 


Comments: Post a Comment



<< Home

This page is powered by Blogger. Isn't yours?