Tuesday, March 22, 2011
लहरों की बिखरन:डा. प्रमोद कुमार
दु:खी मन मेरे मत रह चंचल
चंचलता में खोया जीवन,
इन दो नयनों की धाराओं में
क्यों बहा दिया जीवन का स्वप्न ?
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
खड़ा किनारे क्यों तकता अब
लहरों की लुप्त गहन-बिखरन,
अब फिर न बैचेन बना तू
अन्धकारमय रात्रि कोमल क्षण
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
काली छाया घोर निशा में
उज्जवलता प्रकाशित कर,
इस बुझ्टा दीप में फिर से
कर दे नई दीप्ति का जन्म
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
न बैठ यहॉ यासू बहा तू
मिल जा नई धारा के संग,
मन चंचलता त्याग बना अब
कुछ और नये जीवन के स्वप्न
दु:खी मन मेरे…..
दु:खी मन मेरे मत रह चंचल
चंचलता में खोया जीवन,
इन दो नयनों की धाराओं में
क्यों बहा दिया जीवन का स्वप्न ?
-----------------------------------------
डा. प्रमोद कुमार
Email: drpk1956@gmail.com
drpramod.kumar@yahoo.in
दु:खी मन मेरे मत रह चंचल
चंचलता में खोया जीवन,
इन दो नयनों की धाराओं में
क्यों बहा दिया जीवन का स्वप्न ?
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
खड़ा किनारे क्यों तकता अब
लहरों की लुप्त गहन-बिखरन,
अब फिर न बैचेन बना तू
अन्धकारमय रात्रि कोमल क्षण
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
काली छाया घोर निशा में
उज्जवलता प्रकाशित कर,
इस बुझ्टा दीप में फिर से
कर दे नई दीप्ति का जन्म
दु:खी मन मेरे . . . . . . . .
न बैठ यहॉ यासू बहा तू
मिल जा नई धारा के संग,
मन चंचलता त्याग बना अब
कुछ और नये जीवन के स्वप्न
दु:खी मन मेरे…..
दु:खी मन मेरे मत रह चंचल
चंचलता में खोया जीवन,
इन दो नयनों की धाराओं में
क्यों बहा दिया जीवन का स्वप्न ?
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डा. प्रमोद कुमार
Email: drpk1956@gmail.com
drpramod.kumar@yahoo.in
